द रीट स्पेशल डेस्क, अंबिकापुर/ रायपुर
छत्तीसगढ़ सरकार के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल का एक पुराना पत्र सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। पत्र में मंत्री ने अपने पारिवारिक सदस्य के लिए निशुल्क 108 एम्बुलेंस एवं सपोर्टेड वेंटिलेटर वाहन उपलब्ध कराने का अनुरोध स्वास्थ्य विभाग से किया है। अब इस मामले को लेकर सत्ता के दुरुपयोग और वीआईपी संस्कृति को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल द्वारा स्वास्थ्य विभाग को लिखे गए एक पत्र ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। 9 मई 2026 को लिखे गए इस पत्र में मंत्री ने अपने पारिवारिक सदस्य, जो गंभीर रूप से बीमार बताए गए हैं, के लिए रायपुर से सरगुजा जिले के अंबिकापुर तक निशुल्क 108 एम्बुलेंस और सपोर्टेड वेंटिलेटर वाहन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
पत्र में मंत्री ने स्वयं उल्लेख किया है कि मरीज उनके पारिवारिक सदस्य हैं तथा आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण निशुल्क सुविधा उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है। इसके बाद विपक्षी दलों और सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या एक मंत्री को अपने आधिकारिक लेटरहेड और पद का उपयोग निजी पारिवारिक कार्य के लिए करना चाहिए?
पत्र में क्या लिखा है?
प्रति,
आयुक्त सह संचालक
स्वास्थ्य सेवाएं, रायपुर (छ.ग.)
विषय :- सपोर्ट युक्त वेंटिलेटर निःशुल्क 108 एम्बुलेंस वाहन उपलब्ध कराने के संबंध में।
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उपरोक्त विषयान्तर्गत लेख है कि हमारे पारिवारिक सदस्य मरीज दुर्गा अग्रवाल पति पूरन अग्रवाल उम्र 53 वर्ष (मो………………) पता – अम्बिकापुर जिला – सरगुजा (छ.ग.) की निवासी है। जिनका उपचार रामकृष्ण अस्पताल, रायपुर (छ.ग.) में कराया जा रहा था, जिन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया है। इलाज में खर्च एवं आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण मरीज के परिजनों द्वारा उनके गृहग्राम अम्बिकापुर जिला – सरगुजा (छ.ग.) में ले जाने हेतु सपोर्ट युक्त वेंटिलेटर निःशुल्क 108 एम्बुलेंस वाहन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है।
अतः आप हमारे पारिवारिक सदस्य के उपरोक्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यथाशीघ्र सपोर्ट युक्त वेंटिलेटर निःशुल्क 108 एम्बुलेंस वाहन उपलब्ध कराने की कार्यवाही करेंगे।
भवदीय
(राजेश अग्रवाल)
मंत्री
पत्र आया सामने, तो मचा बवाल
इस विषय में लोगों का कहना है कि 108 एम्बुलेंस सेवा आम जनता के लिए बनाई गई आपातकालीन सेवा है। यदि किसी आम नागरिक को ऐसी सुविधा चाहिए होती है, तो उसे निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। ऐसे में मंत्री के पत्र से यह संदेश जाता है कि सत्ता में बैठे लोगों को विशेष सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी तंत्र पर दबाव बनाया जा सकता है।
वहीं मंत्री समर्थकों का तर्क है कि पत्र में केवल अनुरोध किया गया है, कोई आदेश नहीं दिया गया है। उनका कहना है कि यदि मरीज वास्तव में गंभीर स्थिति में था और आर्थिक रूप से कमजोर था, तो मानवीय आधार पर सहायता मांगना गलत नहीं माना जाना चाहिए।
हालांकि बड़ा सवाल यही है कि क्या एक संवैधानिक पद पर बैठे मंत्री को निजी पारिवारिक मामले में सरकारी लेटरहेड और अपने पद की शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए? और यदि यही सुविधा किसी आम नागरिक को चाहिए होती, तो क्या उसे भी इतनी आसानी से उपलब्ध हो पाती?
फिलहाल इस मामले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन वायरल पत्र ने वीआईपी संस्कृति और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
सवाल जो उठ रहे हैं:
* क्या मंत्री का आधिकारिक लेटरहेड निजी कार्य के लिए इस्तेमाल होना चाहिए?
* क्या 108 जैसी सार्वजनिक सेवा में जनप्रतिनिधियों के लिए अलग व्यवस्था है?
* क्या आम नागरिक को भी ऐसी ही प्राथमिकता मिलती?
* क्या यह मानवीय सहायता का मामला है या पद के प्रभाव का उपयोग?
(नोट: द रीट ने अपने विश्वसनीय सूत्रों से ये ख़बर निकाली है। हम ये बिल्कुल दावा नहीं कर रहे हैं कि मंत्री ने अपने पद का दुरुपयोग किया है । पाठक अपने विवेक से निर्णय लें। उपलब्ध पत्र के आधार पर सत्ता के दुरुपयोग के आरोप और सवाल सामने आए हैं। किसी जांच एजेंसी या सक्षम प्राधिकरण ने अभी तक इसे नियमों का उल्लंघन या सत्ता का दुरुपयोग घोषित नहीं किया है।)

