द रिट न्यूज़ नेटवर्क, रायपुर
पंडित लखनलाल मिश्र का जीवन स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में त्याग, साहस और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। वे छत्तीसगढ़ के एक प्रतिष्ठित मालगुजार परिवार से संबंध रखते थे और उनके पारिवारिक परिवेश में सामाजिक सेवा और देशभक्ति की गहरी जड़ें थीं। उनका जन्म 24 सितंबर 1909 को हुआ था और उनका जीवन त्याग, सेवा और राष्ट्रभक्ति का प्रतिमान बना। वे अंग्रेजों के शासनकाल में पुलिस दरोगा के रौबदार पद पर सं 1932 से कार्यरत थे, लेकिन उनके मन में सदैव एक टीस थी – देश के लिए खुलकर कुछ न कर पाने की पीड़ा।

वे ब्रिटिश प्रशासन का हिस्सा जरूर थे, लेकिन उनके भीतर जल रही राष्ट्रप्रेम की ज्वाला कभी मंद नहीं हुई। पुलिस की वर्दी पहने होने के बावजूद, वे स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों और गांधीजी के सिद्धांतों के प्रति गहरी आस्था रखते थे और स्थानीय क्रांतिकारियों के बहुत सहयोग किया करते थे। लेकिन, पद की सीमाएं और दायित्व उन्हें खुलकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से रोकते थे। देशवासियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते देख, उनका मन व्यथित हो उठता था। उनके लिए वर्दी और राष्ट्रप्रेम के बीच का यह संघर्ष असहनीय होने लगा था। रामधारी सिंह दिनकर की उन पंक्तियों का उल्लेख वे सदैव करते थे जो उनके द्वन्द्व को परिलक्षित करती हैं कि –
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
यह अंतर्द्वंद्व धीरे-धीरे उनके भीतर क्रांति की भावना को और अधिक बलवती करने लगा।
15 दिसंबर 1945 की घटना
15 दिसंबर 1945 को 36 वर्षीय लखनलाल मिश्र जी की यह टीस दुर्ग रेलवे स्टेशन पर एक ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रकट हुई। पूर्व आई.सी.एस अधिकारी रहे श्री आर.के. पाटिल एक राष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत करने नागपूर जा रहे थे, इसी दरमियान दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर कुछ देर रुककर उनका स्थानीय राष्ट्रवादी नेताओं से मुलाकात करने का कार्यक्रम था। पूर्व में श्री पाटिल दुर्ग के कलेक्टर रह चुके थे इसलिए वहाँ उनकी पैठ थी और इस बात को ध्यान में रखकर तत्कालीन पुलिस प्रशासन ने स्टेशन पर अपनी मुस्तैदी सुनिश्चित रखने का निर्णय लिया ताकि ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध कोई माहौल न पनप सके। इसे सुनुशचित करने जिले के वरिष्ठतं दरोगा पं लखनलाल मिश्र को एक टुकड़ी के साथ तैनात किया गया था।
त्याग के प्रतिमूर्ति
अपने भरे पूरे परिवार की चिंता न करते हुए पंडित मिश्रा ने उसी क्षण अपनी पुलिस की नौकरी त्यागकर स्वतंत्रता प्राप्त करने के दुर्गम पथ के पथिक हो गए। वे अपने गृह ग्राम मुरा लौटे और राष्ट्रीय चेतना जागरण के कार्यों में अपना जीवन व्यतीत करने लगे। यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल क्रांतिकारी आंदोलनों या हथियारों के माध्यम से ही नहीं, बल्किआंतरिक संघर्ष, आत्मबलिदान और नैतिक साहस के माध्यम से भी लड़ा जा सकता है। पंडित मिश्र साहित्य और कविता के माध्यम से भी समाज में जागरूकता लाने का कार्य करते थे। वे तुलसीदास, कबीर और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित थे।
