भोपाल
बुदनी की पावन धरा पर स्थित गुंजारी नर्मदा संगम घाट आज पुनः उस दिव्य अनुभूति का साक्षी बना, जहां श्रद्धा और सेवा एकाकार होकर जनचेतना का नया इतिहास रचती दिखाई दी। मां नर्मदा की शांत, कल-कल बहती धारा में जब जनप्रतिनिधि, संत और आमजन एक साथ श्रमदान में जुटे, तो वह दृश्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागरण का सजीव प्रतीक बन गया। पंचायत एवं ग्रामीण विकास एवं श्रम मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने श्रमदान कर यह स्पष्ट किया कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो अपने आचरण से प्रेरणा देता है।
नर्मदा परिक्रमा के तपस्वी, पूज्य दादागुरु जी महाराज की गरिमामयी उपस्थिति ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कर दिया। चार बार नर्मदा परिक्रमा पूर्ण कर चुके और केवल नर्मदा जल का सेवन करने वाले संत का संगम पर आगमन मानो स्वयं मां नर्मदा का आशीर्वाद प्रतीत हुआ। दादागुरु जी महाराज ने संगम के समग्र विकास पर अपने विचार व्यक्त करते हुए इसे केवल एक भौतिक स्थल नहीं, बल्कि साधना, आत्मशुद्धि और आंतरिक जागरण का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि जीवन की आधारशिला हैं, जिनकी पवित्रता बनाए रखना हम सभी का धर्म है। उन्होंने “जल गंगा संवर्धन अभियान” के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश सरकार, मंत्री पटेल एवं जनभागीदारी के संयुक्त प्रयासों से इस प्राचीन धरोहर को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जो वर्षों से उपेक्षित रही थी। आज उसी प्राचीन घाट पर जिस प्रकार स्वच्छता और विकास के कार्य गति पकड़ रहे हैं, वह वास्तव में अनुकरणीय है और अन्य स्थानों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा।
मंत्री पटेल ने कहा कि नदियों का संरक्षण केवल शासन का दायित्व नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का दर्पण है। उन्होंने स्वच्छता को अभियान से आगे बढ़ाकर जीवन का संस्कार बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों को व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करेगा, तभी स्थायी परिवर्तन संभव हो सकेगा। उन्होंने संगम स्थल पर चल रहे स्वच्छता एवं संरक्षण कार्यों का निरीक्षण करते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए, जिससे इस पावन स्थल का विकास निरंतर और सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ता रहे।
गुंजारी नर्मदा संगम घाट पर आज का यह आयोजन प्रशासन, आध्यात्म और जनसहभागिता का अद्भुत संगम बन गया। श्रमदान करते हाथ, संतों का आशीर्वाद और जनसमूह की सक्रिय भागीदारी ने मिलकर यह सिद्ध कर दिया कि जब सेवा को साधना का रूप मिलता है, तब परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है।
माँ नर्मदा की पावन धारा के साक्ष्य में लिया गया यह संकल्प केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, सुंदर और संस्कारित धरोहर का वचन है। यह आयोजन हमें यह भी स्मरण कराता है कि प्रकृति की सेवा ही सच्ची पूजा है और जन सहभागिता ही उसका सबसे प्रभावी मार्ग है।

