Punjab Caste Survey: पंजाब में 28 हजार कर्मचारी खटखटाएंगे हर घर का दरवाजा, जानें सर्वे के पीछे का ‘असली खेल’

चंडीगढ़ 

पंजाब की सियासत और सामाजिक ताने-बाने में 1 अप्रैल 2026 से एक ऐसी हलचल शुरू हो चुकी है, जो आने वाले दशकों तक अपना असर छोड़ेगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब के पहले जाति आधारित सामाजिक-आर्थिक सर्वे का बिगुल फूंक दिया गया है। करीब 250 करोड़ रुपये के भारी भरकम बजट और 28 हजार प्रगणकों की फौज के साथ पंजाब के करीब 65 लाख परिवारों का दरवाजा खटखटाने की यह कवायद जारी है। सरकार का लक्ष्य साफ है कि अगले तीन महीनों में पंजाब के हर घर का कच्चा चिट्ठा सरकारी फाइलों में दर्ज हो जाए।

 हम समझेंगे कि क्या यह सिर्फ एक सरकारी गिनती है या फिर पंजाब की रवायतों और हकीकतों को बदलने वाला कोई बड़ा मास्टरप्लान। आखिर क्यों पड़ी इस भारी भरकम सर्वे की जरूरत ?
हकीकत यह है कि पंजाब में अनुसूचित जाति आबादी करीब 32 प्रतिशत है, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा है। लेकिन यहां एक बड़ा पेंच है। यह आबादी कोई एकजुट समूह नहीं है। इस वर्ग में वाल्मीकि, रविदासिया, अधर्मी और मजहबी सिख जैसी कई जातियां शामिल हैं। इन सभी जातियों के बीच अपनी-अपनी अलग चुनौतियां और दूरियां हैं। अब तक सरकारों के पास कोई ठोस डाटा नहीं था कि विकास का पैसा वाकई किस घर की दहलीज तक पहुंचा है और कौन सा वर्ग आज भी पीछे छूटा हुआ है। यह सर्वे इसी बड़े डाटा गैप को भरने की एक गंभीर कोशिश है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और कानूनी पेच
इस सर्वे का एक बहुत गहरा कानूनी कनेक्शन भी है। अगस्त 2024 का वह ऐतिहासिक दिन याद कीजिए जब सुप्रीम कोर्ट ने द स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह केस में एक अहम फैसला सुनाया था। अदालत ने साफ कहा था कि राज्य सरकारें आरक्षण के अंदर उप-वर्गीकरण कर सकती हैं। यानी आरक्षण के भीतर भी उन जातियों को प्राथमिकता दे सकती हैं जो सबसे ज्यादा पिछड़ी हुई हैं।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट की एक सख्त शर्त भी थी। कोर्ट का कहना था कि सरकारों के पास ऐसा करने के लिए मात्रात्मक और विश्वसनीय डाटा होना चाहिए। एक अप्रैल से शुरू हुआ यह सर्वे असल में वही डाटा जुटाने की कानूनी कवायद है, जिससे कल को सरकार के किसी भी फैसले को अदालत में चुनौती ना दी जा सके।

सियासत की बिसात और 2027 के चुनाव का कनेक्शन
जाहिर है जहां डाटा है, वहां राजनीति भी होगी। पंजाब की राजनीतिक पिच पर फिलहाल सभी दल इस सर्वे के साथ खड़े दिख रहे हैं। कांग्रेस जहां इसे राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और उनके निरंतर दबाव की जीत बता रही है, वहीं भाजपा के दिग्गज नेता भी इसे सामाजिक न्याय के लिए एक क्रांतिकारी कदम मान रहे हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए यह अपना चुनावी वादा पूरा करने और 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़े वोट बैंक को साधने का सीधा मौका है।

निजता का डर: क्या सुरक्षित रहेगी आपकी निजी जानकारी ?
इस बड़े कदम के साथ सबसे बड़ी चिंता निजता की उठ रही है। जब 28 हजार सरकारी कर्मचारी आपके घर आकर आपकी जाति, आपकी कमाई और आपकी निजी जिंदगी के सवाल पूछेंगे, तो डर लगना लाजमी है। क्या यह डाटा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा? क्या डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट के इस दौर में सरकार लोगों की प्रोफाइलिंग होने से रोक पाएगी?

हालांकि मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पूर्ण गोपनीयता का भरोसा दिया है, लेकिन डिजिटल दौर में भरोसे और हकीकत के बीच हमेशा एक बारीक लकीर होती है। अंत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह डाटा वाकई पंजाब की सदियों पुरानी असमानता को खत्म करने का औजार बनेगा या फिर यह जातियों की दीवारें और ऊंची कर देगा। सर्वे के नतीजे ही भविष्य के इस पंजाब की असली तस्वीर साफ करेंगे।

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