नई दिल्ली
उत्तराखंड की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख का ऐलान कर दिया गया है। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर टिहरी जिले के नरेंद्र नगर स्थित राजदरबार में शास्त्रों और पंचांग गणना के बाद यह फैसला लिया गया कि बदरीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को खोले जाएंगे। जानकारी के मुताबिक, राजदरबार में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान महाराजा मनु जयेंद्र शाह ने स्वयं कपाट खुलने की तिथि की घोषणा की। इस मौके पर राजपुरोहित आचार्य कृष्ण प्रसाद उनियाल ने पंचांग, ग्रह-नक्षत्र और शुभ योगों का अध्ययन कर बताया कि 23 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट का समय कपाट खोलने के लिए शुभ है। वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद विधिवत रूप से तिथि घोषित की गई।
कैसे खुलते हैं बदरीनाथ धाम के कपाट, क्या-क्या होती हैं खास परंपराएं
बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया पूरी तरह शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार होती है। कपाट खुलने से पहले भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना विशेष विधि से की जाती है। सबसे पहले मंदिर परिसर को फूलों से सजाया जाता है और सिंहद्वार पर पारंपरिक ढंग से पूजा होती है।
कपाट खुलने के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में गणेश पूजा के साथ कार्यक्रम की शुरुआत होती है। इसके बाद शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर के मुख्य द्वार के ताले खोले जाते हैं। जैसे ही कपाट खुलते हैं, मंदिर परिसर “जय बद्री विशाल” के जयकारों से गूंज उठता है।
कपाट खुलने के बाद सबसे पहले भगवान बदरीनाथ के अखंड दीप के दर्शन कराए जाते हैं, जो शीतकाल में भी निरंतर जलता रहता है। इसके बाद भगवान की महाभिषेक पूजा होती है और विशेष श्रृंगार किया जाता है। कपाट खुलने के पहले दिन केवल सीमित समय के लिए ही श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति दी जाती है।
परंपरा के अनुसार, कपाट खुलने के समय डिमरी समाज के प्रतिनिधि और मंदिर के मुख्य रावल विशेष भूमिका निभाते हैं। कपाट खुलने के बाद नियमित पूजा, दर्शन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं।
क्यों खास है कपाट खुलने का दिन
मान्यता है कि बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस शुभ पल के साक्षी बनने के लिए बदरीनाथ पहुंचते हैं।

