नई दिल्ली
भारत-पाकिस्तान मुकाबले को लेकर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) का ताजा यू-टर्न सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि उसकी विफल राजनीति की खुली स्वीकारोक्ति है. 2026 टी20 विश्व कप से पहले जिस बायकॉट की धमकी को सिद्धांत, स्वाभिमान और सुरक्षा का मुद्दा बनाकर उछाला गया, वही अंततः पाकिस्तान की कमजोरी बन गई. मैच अब खेला जाएगा- बिना शर्त, बिना रियायत…. और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सच है.
धमकी की शुरुआत, लेकिन दिशा विहीन
PCB ने जिस आक्रामक भाषा में भारत के खिलाफ खेलने पर आपत्ति जताई, उसने शुरू से यह संकेत दे दिया था कि यह फैसला कम और दबाव की राजनीति ज्यादा है. सुरक्षा जैसे पुराने तर्क दोहराए गए, लेकिन कोई नई परिस्थिति, कोई नया खतरा या कोई ठोस रिपोर्ट सामने नहीं रखी गई
यह बायकॉट कोई अंतिम निर्णय नहीं था, बल्कि सौदेबाजी का औजार था और यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बनी.
सीधे टकराव से बचने की चाल
भारत के खिलाफ सीधे खड़े होने की हिम्मत PCB में नहीं दिखी. इसकी बजाय बांग्लादेश की मांगों को आगे कर दिया गया, ताकि विवाद को क्षेत्रीय सहमति का रूप दिया जा सके. यह एक सोची-समझी रणनीति थी- खुद पीछे रहो, माहौल दूसरों के जरिए बनाओ और ICC पर दबाव डालो.
… लेकिन यह चाल ज्यादा देर नहीं चल सकी. ICC के भीतर यह स्पष्ट हो गया कि बांग्लादेश का नाम केवल ढाल है, असली एजेंडा पाकिस्तान की अपनी राजनीतिक जिद है.
बांग्लादेश के साथ 'डबल गेम'
यही वह मोड़ था, जहां पाकिस्तान की राजनीति पूरी तरह बेनकाब हो गई.जिस बांग्लादेश को PCB ने बायकॉट की मुहिम में आगे किया, उसी को यू-टर्न के वक्त पूरी तरह किनारे कर दिया गया. न कोई साझा बयान, न कोई संयुक्त विरोध, न कोई नैतिक जिम्मेदारी.दबाव बनाने के लिए बांग्लादेश का इस्तेमाल हुआ, लेकिन जब ICC के सामने चाल नाकाम हुई, तो पाकिस्तान ने अकेले पीछे हटना बेहतर समझा.
यह ‘साझा चिंता’ नहीं, बल्कि सुविधाजनक साझेदारी थी- काम निकलते ही खत्म.
यहीं PCB का दोहरा चरित्र उजागर होता है.पहले बांग्लादेश को ढाल बनाना और फिर हालात बिगड़ते ही उसे मैदान में अकेला छोड़ देना.
क्रिकेट नहीं, आर्थिक हकीकत ने तोड़ा भ्रम
PCB शायद यह भूल बैठा कि आधुनिक क्रिकेट भावनाओं और नारों से नहीं चलता. भारत–पाक मुकाबला किसी भी ICC टूर्नामेंट की आर्थिक रीढ़ है. इस एक मैच से जुड़े प्रसारण अधिकार, विज्ञापन, प्रायोजन और वैश्विक दर्शक संख्या पूरे आयोजन की दिशा तय करते हैं.
इस मैच के न होने से ICC को झटका जरूर लगता, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान पाकिस्तान को ही उठाना पड़ता- आर्थिक रूप से भी और क्रिकेटिंग प्रासंगिकता के लिहाज से भी.
ICC के सामने नहीं चलीं शर्तें
PCB की उम्मीद थी कि हाइब्रिड मॉडल, विशेष प्रावधान या राजनीतिक सहानुभूति के जरिए वह ICC को झुका लेगा. लेकिन परिषद ने इस बार साफ कर दिया कि टूर्नामेंट किसी एक बोर्ड की जिद से नहीं चलेगा.
जब यह संदेश स्पष्ट हो गया कि न तो ढांचा बदलेगा और न ही भारत पर कोई दबाव बनेगा, PCB का सख्त रुख अचानक पिघल गया.
भारत–पाक मैच खेलने पर सहमति बन गई, लेकिन यह सहमति किसी समझौते की जीत नहीं, बल्कि मजबूरी की स्वीकारोक्ति है. PCB न तो कोई शर्त मनवा सका, न किसी तरह की नैतिक या कूटनीतिक बढ़त हासिल कर पाया. जिस बायकॉट को ‘सिद्धांत’ बताया गया था, वह अंततः खोखली बयानबाजी साबित हुआ.
… साख पर गहरा दाग
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा नुकसान पाकिस्तान क्रिकेट की विश्वसनीयता को हुआ. बार-बार राजनीतिक दबाव की रणनीति अपनाकर PCB ने यह संदेश दिया कि वह क्रिकेट को खेल की बजाय मंच के रूप में इस्तेमाल करता है.
इसका असर सिर्फ बोर्ड की छवि पर नहीं, बल्कि खिलाड़ियों, प्रशंसकों और अंतरराष्ट्रीय भरोसे पर भी पड़ता है.
नतीजा पहले से तय था
भारत-पाक मुकाबले को लेकर PCB की रणनीति हर मोर्चे पर विफल रही. बायकॉट की धमकी बेअसर रही, बांग्लादेश की आड़ बेनकाब हुई और ICC पर दबाव नहीं बन सका.अंततः वही हुआ, जो शुरू से तय था- मैच खेला जाएगा, नियम ICC तय करेगी और झुकना पाकिस्तान को ही पड़ा.

