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सब्जी की खेती करने वाले किसानों के लिए खुशखबरी, सरकारी योजना के तहत बीज पर भारी अनुदान

समस्तीपुर
 जिले के सभी 18 प्रखंडों में सब्जियों की खेती होती है। मिट्टी और जलवायु अनुकूल होने के बावजूद सब्जी की खेती का दायरा अपेक्षित गति से नहीं बढ़ा है।

पिछले छह वर्षों में रकबे में महज 172 हेक्टेयर की वृद्धि हुई। वित्तीय वर्ष 2020-21 में जिले में 24 हजार 103 हेक्टेयर में सब्जियों की खेती होती थी।

वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 24 हजार 275 हेक्टेयर हो गई। यानी छह वर्षों में क्षेत्रफल में एक प्रतिशत से भी कम बढ़ोतरी हुई।

जिले में कुल 27 कोल्ड स्टोरेज
इसके उलट, आलू की खेती का रकबा इस अवधि में 1,275 हेक्टेयर बढ़ा। वर्ष 2020-21 में 11 हजार 750 हेक्टेयर में आलू की खेती होती थी, जो 2025-26 में बढ़कर 13 हजार 25 हेक्टेयर हो गई।

जिले में कुल 27 कोल्ड स्टोरेज संचालित हैं। उत्पादन बढ़ने के बावजूद उपज की बिक्री और उचित कीमत हासिल करना किसानों के लिए चुनौती बना हुआ है। गोभी, टमाटर और आलू की अच्छी पैदावार के बाद भी कीमत गिरने से लागत निकालना मुश्किल हो जाता है। पिछले साल कई किसानों को उचित भाव नहीं मिलने पर फसल खेतों में ही छोड़नी पड़ी थी।

बीज पर 75 प्रतिशत तक अनुदान
सब्जी उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए बिहार सरकार के कृषि विभाग के उद्यान निदेशालय की ओर से योजनाएं चलाई जा रही हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 की योजना में चयनित सब्जियों के बीज वितरण पर निर्धारित इकाई लागत या वास्तविक बीज मूल्य, जो कम हो, उस पर 75 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है।

रबी मौसम में मटर, गाजर, चुकंदर और बैंगन तथा गरमा मौसम में कद्दू, नेनुआ, करेला, भिंडी, खीरा, खरबूजा और तरबूज इसके दायरे में हैं। लाभ के लिए किसानों को कृषि विभाग के डीबीटी पोर्टल पर पंजीकरण कराना और उद्यान निदेशालय की वेबसाइट से आनलाइन आवेदन करना होता है।

 चयन उपलब्ध लक्ष्य और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होता है। सूक्ष्म सिंचाई, संरक्षित खेती और बागवानी विकास योजनाओं में भी पात्र किसानों को सहायता दी जाती है।

कीमत गिरने से खेतों में बर्बाद होती उपज
एक साथ अधिक उपज बाजार पहुंचने पर कीमतें गिरती हैं और सीमित भंडारण सुविधा परेशानी बढ़ाती है। टमाटर और गोभी जल्दी खराब होने वाली फसलें हैं, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव नहीं है।

मांग कम होने पर किसानों को कम दाम पर उपज बेचनी पड़ती है। कई बार तोड़ाई और ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल होता है। भंडारण सुविधा के अभाव में आलू उत्पादकों को भी बाजार भाव के अनुसार बिक्री करने में दिक्कत आती है।

शीतगृह और प्रसंस्करण इकाइयों की मांग
आलू उत्पादक किसान बलराम मिश्र ने बताया कि बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर काफी खर्च होता है। फसल तैयार होने पर कीमत गिरने से लागत निकालना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने प्रखंड स्तर पर सस्ते शीतगृह, भंडारण पर अनुदान और बाजार भाव की नियमित जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की।

टमाटर एवं गोभी उत्पादक किसान संजय कुमार ने कहा कि आवक बढ़ते ही कीमत गिर जाती है और कई बार तोड़ाई-ढुलाई का खर्च भी नहीं निकलता। उन्होंने गांवों में सब्जी संग्रह केंद्र, कोल्ड चेन और टमाटर से सास, प्यूरी सहित अन्य उत्पाद बनाने वाली प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने तथा किसानों की उपज खरीदने की व्यवस्था करने की मांग की।

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