नई दिल्ली
ईरान में चल रहे युद्ध ने तमाम मिथकों को तोड़ने के साथ ही UN की कमजोरियों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में वेस्ट एशिया में अस्थिरता लाने वालों के खिलाफ एक मुकम्मल निंदा प्रस्ताव तक पारित नहीं किया जा सका. इस बात पर भी विचार नहीं किया गया कि एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ एकतरफा सैन्य कार्रवाई कहां तक उचित है. इसके अलावा ग्लोबल पीस के लिए जिम्मेदार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद होर्मुज स्ट्रेट जैसे समुद्री मार्ग को भी बाधित होने से नहीं बचा सका. ईरान जंग की वजह से पूरी दुनिया में इन दिनों उथल-पुथल की स्थिति है. होर्मुज जलडमरूमध्य की समस्याओं ने इस तनाव को ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस में तब्दील कर दिया है. जिन देशों का इस टकराव से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. पेट्रोल-डीजल और गैस की आपूर्ति बाधित होने की वजह से कई देशों में आपात स्थिति पैदा हो गई है. इतना सबकुछ हो रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और निर्णय लेने वाली इसकी सर्वोच्च संस्था UNSC मूकदर्शक बना हुआ है. दुनिया अमेरिका, इजरायल और ईरान के ट्राएंगल में बुरी तरह से फंस गई है. एक तरह से ईरान जंग की बंधक बन चुकी है. ऐसे हालात में भारत ने एक बार फिर से UNSC में तत्काल सुधार की बात कही है. फ्रांस में इन दिनों G-7 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक चल रही है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इसमें हिस्सा ले रहे हैं. G-7 के मंच से जयशंकर ने UNSC में रिफॉर्म करने पर जोर दिया है. भारत लंबे समय से UNSC की स्थाई सदस्यता हासिल करने का दावा पेश करता आ रहा है. हालांकि, भारत के इस प्रयास को चीन पलीता लगाता रहा है।
एस जयशंकर ने फ्रांस में आयोजित G7 Foreign Ministers’ Meeting के दौरान वैश्विक शासन व्यवस् (Global Governance) था में सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में तत्काल सुधार की मांग उठाई. उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक ढांचा वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप नहीं है और इसमें व्यापक बदलाव जरूरी हैं. फ्रांस में 26-27 मार्च को आयोजित इस बैठक में जयशंकर ने शांति स्थापना अभियानों को अधिक प्रभावी बनाने, मानवीय सहायता आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने और वैश्विक संकटों के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता पर भी बल दिया. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि बैठक में ग्लोबल गवर्नेंस सुधार प्रमुख मुद्दा रहा. ईरान जंग और होर्मुज संकट को देखते हुए उनका यह स्टैंड अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. अब दुनिया के सबसे पावरफुल देशों पर जिम्मेदारी है कि वे इस बाबत क्या करते हैं।
भारत फिर बना ग्लोबल साउथ की आवाज
जयशंकर ने विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के देशों से जुड़े मुद्दों को उठाया, जिनमें ऊर्जा संकट, उर्वरक की कमी और खाद्य सुरक्षा शामिल हैं. उन्होंने कहा कि इन समस्याओं का समाधान वैश्विक स्तर पर सामूहिक प्रयासों से ही संभव है. भारत लंबे समय से UNSC में सुधार और स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है. वर्तमान में UNSC के पांच स्थाई सदस्य (China, France, Russia, United Kingdom और United States of America) को वीटो शक्ति प्राप्त है, जिसे लेकर लंबे समय से असंतुलन की आलोचना होती रही है।
वेस्ट एशिया क्राइसिस पर फोकस
बैठक के दौरान वेस्ट एशिया संकट भी प्रमुख चर्चा का विषय रहा. Strait of Hormuz में तनाव के चलते वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है. यह मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी आपूर्ति के लिए अहम है. हालिया घटनाओं के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों में तेजी देखी गई है, जिसका असर भारत सहित कई देशों पर पड़ा है. इस बैठक में जयशंकर वेस्ट एशिया की स्थिति पर समन्वित रणनीति बनाने पर भी चर्चा कर रहे हैं, ताकि समुद्री मार्ग सुरक्षित और खुला रह सके. भारत के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है।
G-7 काफी अहम
G-7 में शामिल प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका) वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक मुद्दों पर समन्वय के लिए इस मंच का उपयोग करती हैं. इस बार भारत के अलावा सऊदी अरब, दक्षिण कोरिया और ब्राजील को भी आमंत्रित किया गया है. बैठक के इतर जयशंकर अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं भी करेंगे, जिनमें क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग और वैश्विक संकटों से निपटने के उपायों पर चर्चा होने की संभावना है।

