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BJP ने बंगाल की नई सरकार के लिए चुनी 9 मई की तारीख, जानिए पीछे की वजह

कोलकाता
 भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में शानदार जीत दर्ज पूर्वी भारत के उस अहम गढ़ में प्रवेश कर लिया. इस शानदार जीत के बाद बीजेपी ने नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के लिए 9 मई की तारीख तय की है. ऐसे में लोग जानना चाहते हैं कि बीजेपी ने इस दिन का चयन क्यों किया है. बताया जा रहा है कि बुधवार को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह कोलकाता आएंगे. वह यहां बीजेपी के जीते हुए विधायकों से बातचीत करेंगे जिसके बाद विधायक दल का नेता और बंगाल के नये मुख्यमंत्री के नाम का फैसला होगा 

बंगाल के लिए खास है 9 तारीख
दरअसल, 9 मई को गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती होती है. बंगाल की संस्कृति से रविंद्र नाथ टैगोर के संगीत और साहित्य का क्या महत्व है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान तृणूमल कांग्रेस और ममता बनर्जी यही आरोप लगाती रहीं कि बीजेपी सत्ता में आते ही बंगाल की संस्कृति से खिलवाड़ करेगी. ऐसे बीजेपी नई सरकार के गठन के लिए रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती का दिन चुना है, ताकि वह टीएमसी के आरोपों का जवाब दे सके कि बीजेपी बंगाल की सभ्यता और संस्कृति का कितना ख्याल करती है. पश्चिम बंगाल BJP अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने भी 9 मई की तारीख पर मुहर लगाई है 

बंगाल में बीजेपी की जीत है खास
पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह निर्णायक जीत सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ममता बनर्जी के लंबे वर्चस्व को बड़ा झटका देते हुए राज्य की राजनीति को नया स्वरूप दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘जनता की शक्ति और सुशासन की जीत’ बताया. 2014 में सीमित उपस्थिति से शुरू हुई भाजपा की यात्रा 2019 में उभार, 2021 में चुनौतियों और अब 2026 में स्पष्ट जनादेश तक पहुंची है। 

यह जीत राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की मजबूत होती राजनीतिक पकड़ को भी दर्शाती है. पार्टी ने अपनी रणनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ रोकने, सीमा बाड़बंदी, सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा, सीएए और यूसीसी जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. साथ ही, कानून-व्यवस्था, औद्योगिक विकास, महिलाओं की सुरक्षा और केंद्र की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। 

प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह जैसे शीर्ष नेताओं के आक्रामक प्रचार ने सत्ता विरोधी लहर को मजबूत किया. हालांकि, जीत के बाद भाजपा के सामने ध्रुवीकृत समाज, क्षेत्रीय पहचान और तृणमूल कांग्रेस के मजबूत विपक्ष जैसी चुनौतियां बनी रहेंगी। 

इसके बावजूद, यह परिणाम एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है, जिसने भाजपा को चुनौती देने वाली पार्टी से सत्तारूढ़ शक्ति में बदल दिया है और बंगाल की राजनीति को नए दौर में पहुंचा दिया है। 

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