S-400 और THAAD को छोड़, भारत का ‘त्रिदेव’ है सबसे ताकतवर, 10,000 KMPH की रफ्तार में खत्म करेगा दुश्मन

नई दिल्ली

ईरान जंग ने पूरी दुनिया को एक बार फिर से हथियारों की रेस में धकेल दिया है. यूरोप से लेकर चीन, भारत समेत तमाम देश अपनी क्षमताओं के अनुसार डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड करने में जुटा है. मॉडर्न वॉरफेयर में फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है. ईरान की कम लागत वाली शाहेद ड्रोन ने अमेरिका और इजरायल को गहरे जख्‍म दिए हैं. वहीं, अमेरिका-इजरायल की घातक मिसाइलों ने ईरान को तबाही की दहलीज पर ला खड़ा किया है. इसमें एक बात सबसे अहम है – अमेरिका, इजरायल और ईरान एक-दूसरे की जमीन पर गए बिना ही तबाही लाई है. विध्‍वंस की ऐसी लकीर खींच दी गई है, जिससे पूरी दुनिया में डर और भय का आलम है. यही वजह है कि अब यूरोप के साथ ही जापान जैसे देश भी अपनी सुरक्षा को लेकर फ‍िक्रमंद हो गए हैं. नई टेक्‍नोलॉजी की मदद से कट‍िंग एज वेपन सिस्‍टम डेवलप करने में अरबों डॉलर का इन्‍वेस्‍टमेंट करने की योजना बनाई जा रही है. भारत भी इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहता है. नेशनल एयर डिफेंस सिस्‍टम प्रोजेक्‍ट मिशन सुदर्शन चक्र पर काम शुरू हो चुका है. इसके साथ ही एक और डिफेंस प्रोजेक्‍ट पर काम चल रहा है. इसके पूरा होने पर एक ऐसा सिस्‍टम डेवलप होगा, जिसके प्रहार के सामने S-400, THAAD, HQ-9B और आयरन डोम जैसे अत्‍याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली भी पस्‍त हो जाएंगे. इस हाइपरसोनिक सिस्‍टम में 3 मिसाइलें होंगी, जिससे हवा, पानी और आसमान अभेद्य क‍िला बन जाएगा. भारत के इस ‘त्रिदेव’ के सामने चीन-पाकिस्‍तान जैसे देशों की हालत खराब होनी तय है ।

जानकारी के अनुसार, भारत की हाइपरसोनिक तकनीक को लेकर महत्वाकांक्षा अब केवल भविष्य की योजना नहीं रही, बल्कि तेजी से वर्तमान सैन्य क्षमता में बदलती दिखाई दे रही है. देश एक बहुस्तरीय (मल्टीलेयर) हाइपरसोनिक स्ट्राइक नेटवर्क विकसित कर रहा है, जो परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Detterent), समुद्री प्रभुत्व और अत्यधिक सटीक हमलों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. ‘डिफेंस डॉट इन’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस रणनीतिक बदलाव के केंद्र में तीन अत्याधुनिक और आपस में जुड़े वेपन सिस्टम हैं – ध्वनि हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (Dhvani HGV), लॉन्ग-रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-AShM) और एक्सटेंडेड ट्रैजेक्टरी लॉन्ग ड्यूरेशन हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल (ET-LDHCM). ये तीनों मिलकर भारत की सैन्य ताकत को नई ऊंचाई देने की दिशा में काम कर रहे हैं ।

ध्‍वनि हाइपरसोनिक ग्‍लाइड व्‍हीकल
ध्वनि हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल भारत के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है. यह लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम है और परमाणु पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है. इसकी रफ्तार मैक-5 से कहीं अधिक बताई जा रही है और इसकी रेंज करीब 10,000 किलोमीटर तक हो सकती है. खास बात यह है कि यह ऊपरी वायुमंडल (upper atmosphere) में अनियमित रास्तों पर ग्लाइड करता है, जिससे इसे ट्रैक और इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है. वर्ष 2026 के दौरान इसके ट्रायल में हीट-रेजिस्टेंट मैटेरियल, टार्गेटिंग सॉफ्टवेयर और अंतिम चरण की नेविगेशन सिस्‍टम की विश्वसनीयता पर फोकस किया जा रहा है ।

लॉन्ग-रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल
दूसरी ओर, LR-AShM भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तैयार की जा रही है. लगभग 1,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली यह मिसाइल चलती मोबाइल नेवी वॉरशिप के साथ-साथ जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को भी निशाना बना सकती है. इसका मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में विरोधियों की गतिविधियों को सीमित करना है. इस मिसाइल की खासियत यह है कि इसमें पूरी तरह स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स और सेंसर का उपयोग किया गया है, जिससे विदेशी निर्भरता समाप्त होती है. इसके भूमि, समुद्र और हवा से लॉन्च किए जाने वाले संस्करण विकसित किए जा रहे हैं, जो इसे एक व्यावहारिक युद्धक हथियार बनाते हैं।

एक्सटेंडेड ट्रैजेक्टरी लॉन्ग ड्यूरेशन हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल
ET-LDHCM इस हाइपरसोनिक ट्राएंगल का तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो क्रूज मिसाइल और ग्लाइड व्हीकल के बीच की कड़ी का काम करता है. वर्ष 2025 में इसके महत्वपूर्ण परीक्षण किए गए थे. यह मिसाइल मैक-8 (तकरीबन 10 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार) से अधिक की गति से उड़ान भर सकती है और 1,500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकती है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी लचीलापन (वर्सेटिलिटी) है. यह उड़ान के दौरान अपना रास्ता बदल सकती है और इसे हवाई जहाज, नौसैनिक जहाज या जमीन से लॉन्च किया जा सकता है. यह उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को भेदने में सक्षम मानी जा रही है।

हाइपरसोनिक मिसाइल क्या होती है?
हाइपरसोनिक मिसाइल ऐसी उन्नत हथियार प्रणाली है, जो ध्वनि की गति (मैक 1) से कम से कम पांच गुना यानी मैक 5 या उससे अधिक रफ्तार से उड़ती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी अत्यधिक गति, सटीकता और रास्ता बदलने की क्षमता है, जिससे इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।

यह पारंपरिक बैलिस्टिक या क्रूज मिसाइलों से कैसे अलग है?
बैलिस्टिक मिसाइलें तय प्रक्षेपवक्र (trajectory) में ऊपर जाकर गिरती हैं, जबकि क्रूज मिसाइलें कम ऊंचाई पर उड़ती हैं लेकिन उनकी गति अपेक्षाकृत कम होती है. हाइपरसोनिक मिसाइल इन दोनों का संयोजन मानी जाती है—यह बहुत तेज होती है और उड़ान के दौरान दिशा बदल सकती है, जिससे दुश्मन की एयर डिफेंस प्रणाली इसे ट्रैक करना मुश्किल पाती है।

हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं?
मुख्य रूप से दो प्रकार होते हैं – हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV), जिसे रॉकेट से ऊंचाई पर ले जाकर छोड़ा जाता है, जहां से यह ग्लाइड करते हुए लक्ष्य तक पहुंचता है. दूसरा, हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल (HCM) जो स्क्रैमजेट इंजन से संचालित होती है और पूरे रास्ते हाइपरसोनिक स्‍पीड बनाए रखती है।

दुनिया में किन देशों के पास यह तकनीक है?
इस क्षेत्र में अमेरिका, रूस और चीन सबसे आगे माने जाते हैं. रूस ने ‘किंजल’ और ‘अवांगार्ड’ जैसे सिस्टम तैनात किए हैं, जबकि चीन ने भी कई सफल परीक्षण किए हैं. अमेरिका भी इस टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम कर रहा है।

भारत की स्थिति क्या है?
भारत भी हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी में तेजी से प्रगति कर रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) का सफल परीक्षण किया है. इसके अलावा, लंबी दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों पर भी काम जारी है, जो भविष्य में भारत की सामरिक क्षमता को काफी मजबूत करेंगी।

हाइपरसोनिक मिसाइल को रोकना इतना मुश्किल क्यों है?
इसकी तीन बड़ी वजहें हैं- अत्यधिक गति (मैक 5 से ज्यादा), कम ऊंचाई पर उड़ान
और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता. इन कारणों से मौजूदा मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे S-400 या THAAD के लिए इसे समय रहते इंटरसेप्ट करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

क्या यह परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं?
हां, हाइपरसोनिक मिसाइलें पारंपरिक और परमाणु – दोनों तरह के वॉरहेड ले जा सकती हैं. यही वजह है कि यह तकनीक वैश्विक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनती जा रही है।

इससे वैश्विक सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, हाइपरसोनिक हथियारों की दौड़ से हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है. कई देशों के पास इनका प्रभावी बचाव नहीं है, जिससे अस्थिरता बढ़ने का खतरा भी जताया जा रहा है।

भविष्य में इस टेक्नोलॉजी का क्या दायरा है?
आने वाले समय में हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी सिर्फ सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकती. इसे अंतरिक्ष मिशन, तेज परिवहन और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियों में भी इस्तेमाल किए जाने की संभावनाएं हैं।

स्क्रैमजेट टेक्‍नोलॉजी
इन सभी प्रणालियों के पीछे सबसे अहम भूमिका स्क्रैमजेट इंजन तकनीक की है, जिसमें भारत ने हाल ही में बड़ी सफलता हासिल की है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने जनवरी 2026 में एक एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट इंजन को 12 मिनट से अधिक समय तक सफलतापूर्वक चलाया. यह उपलब्धि हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को लंबी दूरी तक उच्च गति बनाए रखने में सक्षम बनाती है. यह पूरी प्रगति Defence Research and Development Organisation के वर्षों के अनुसंधान और Hypersonic Technology Demonstrator Vehicle कार्यक्रम की सफलता पर आधारित है. 2024 में ओडिशा के Dr APJ Abdul Kalam Island से किए गए हाइपरसोनिक परीक्षण ने इस दिशा में मजबूत आधार तैयार किया था।

चीन की बढ़त को जवाब
ये तीनों सिस्टम मिलकर भारत की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव दर्शाते हैं. अब भारत केवल जवाबी कार्रवाई पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन की उन्नत रक्षा प्रणालियों को भेदकर त्वरित और सटीक हमला करने की क्षमता भी विकसित कर रहा है. चीन जैसे पड़ोसी देश पहले ही हाइपरसोनिक हथियारों में बढ़त बना चुके हैं, ऐसे में भारत का यह कदम केवल संतुलन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक लचीला, अप्रत्याशित और पूरी तरह स्वदेशी रक्षा तंत्र तैयार करने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकता है।

 

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