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117 साल पुराने जमीन के दस्तावेज अब डिजिटल, बिहार में रिकॉर्ड आधुनिकीकरण अभियान तेज

मुंगेर.

जिला निबंधन कार्यालय में 117 वर्षों के भूमि अभिलेखों को डिजिटल स्वरूप देने की महत्वाकांक्षी परियोजना अंतिम चरण में पहुंच गई है। वर्ष 1908 से 1995 तक के रजिस्टरों और जमीन संबंधी दस्तावेजों का डिजिटाइजेशन तेजी से चल रहा है।

परियोजना पूरी होते ही लोगों को दशकों पुराने रजिस्ट्री दस्तावेजों के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। पुराने रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध होने से दस्तावेजों की खोज आसान होगी और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता भी आएगी। जिला अवर निबंधन पदाधिकारी अश्वनी कुमार ने बताया कि करीब एक वर्ष से पुराने रजिस्टरों और अभिलेखों की स्कैनिंग कर उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित अपलोड किया जा रहा है। डिजिटाइजेशन पूरा होने के बाद मौजा, खाता-खेसरा, रजिस्ट्री की तिथि, क्रेता-विक्रेता या पूर्वजों के नाम के आधार पर भी पुराने दस्तावेज आसानी से खोजे जा सकेंगे। उन्होंने बताया कि वर्ष 1998 के बाद के अधिकांश रिकॉर्ड पहले से ऑनलाइन उपलब्ध हैं, जबकि अब उससे पहले के अभिलेख भी डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किए जा रहे हैं।

रजिस्ट्री के दिन ही मिल रही मूल प्रति
अवर निबंधन पदाधिकारी ने बताया कि पिछले छह माह से रजिस्ट्री कराने वाले लोगों के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर एक लिंक भेजा जा रहा है। इस लिंक के माध्यम से आवेदक अपने दस्तावेज ऑनलाइन देख सकते हैं। साथ ही रजिस्ट्री की मूल प्रति भी उसी दिन उपलब्ध करा दी जाती है, जिससे लोगों को दोबारा कार्यालय का चक्कर नहीं लगाना पड़ता। उन्होंने बताया कि सोमवार और मंगलवार को आधार लिंकिंग प्रणाली में तकनीकी समस्या आने के कारण निबंधन कार्य प्रभावित रहा। विभाग स्तर पर तकनीकी खामी दूर करने का काम जारी है और जल्द ही व्यवस्था पूरी तरह सामान्य होने की उम्मीद है।

बिचौलियों पर होगा नियंत्रण
अश्वनी कुमार ने बताया कि हाल के दिनों में शहरी क्षेत्रों में निबंधन की संख्या में हल्की कमी दर्ज की गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में शुल्क वृद्धि के बावजूद रजिस्ट्री पर विशेष असर नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा कि डिजिटाइजेशन पूरा होने के बाद लोगों को घर बैठे जमीन संबंधी जानकारी मिलेगी, बिचौलियों की भूमिका कम होगी और वर्षों पुराने महत्वपूर्ण अभिलेख सुरक्षित भी रहेंगे।

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